Monday, November 14

शेर की सवारी

एक समय की बात है... गुजरात का राजा था। बड़ा महत्वकांशी। और आत्मविश्वास से भरपूर। जैसा की महत्वकांशी व्यक्ति अक्सर होता है। जुआरियों वाला आत्मविश्वास! एक दिन की बात है राजा जंगल में घूम रहा था। तभी वहां उसे एक शेर ('काला धन') दिखा। राजा ने सोचा अगर इसकी सवारी की जा सके तो दिल्ली की गद्दी मिल सकती है। काम खतरनाक था। पहले भी कुछ लोग ऐसी कोशिश कर चुके थे, मगर सफल नहीं हुए थे। पर राजा महतवकांशी था। चढ़ बैठा शेर पर। और घुमा दी उसकी गर्दन दिल्ली की और। और ये उड़ और वो उड़। जिसने भी देखा भय और विस्मय से ऊँगली दबाने लगा "शेर की सवारी!" लोगों ने कहा। "अनहोनी! अनसुनी! ये जरूर देव या दानव होगा।" कुछ ही दिनों में दिल्ली की गद्दी राजा की थी। राजा का आत्मविश्वास अब चरम पर था। जब भी उसे लगता की लोगों का उत्साह उसके प्रति कम हो रहा है, राजा शेर निकालता और सवारी करने लगता। लोग चुप कर जाते। ऐसे ही कुछ समय निकल गया। फिर एक दिन राजा को लगा की फिर से सवारी करने का समय गया है। लोगों का उत्साह कुछ हल्का होने लगा था। मगर वो भूल गया की शेर तो शेर है। उस दिन शायद शेर का मूड ठीक नहीं था। या बार बार की सवारी से वो तंग गया था। या फिर राजा ने उसके कान कुछ ज्यादा ही उमेठ दिए थे उस दिन। जो भी हो। राजा जैसे ही शेर पर सवार हुआ शेर ने उसे ले पटका...  और राजा चित्त! राजा देव या दानव नहीं, नश्वर था।

Even at that hour when the grey sky of St. Petersburg is shrouded in total darkness and all its race of officials have dined and sated the...